Humming Bird (Hindi)

Humming Bird (Hindi) (Paperback)

By Mukesh Kumar Sinha 
R 100
R 90
Publisher: Hind Yugm
Edition: Paperback
Language: Hindi
ISBN: 9381394946
EAN: 9789381394946
No. of Pages: 112
Publish Date: 2014-1-1
Binding: Paperback
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Description

About the Book

'Humming Bird' is a collection of poems by Mukesh Kumar Sinha. The anthology is a tribute to dreams and fears of common man. His poems talk about almost all the feelings under the sun, love, lust, intrigue, fantasy, nostalgia, surrender, victory, pain, dejection and growth. Spontaneous emotions of the poet are cascading like waterfall in the hills, speaking of dust and rust as much as delight and desire.

Brevity in the soul of composer's thought is in full flourish. 'Humming Bird' has emerged as the hymn of holistic imagination. Whiff of gentle breeze in the woodland of India's poetry streets.

About the Author

Mukesh Kumar Sinha was born in Begusarai Bihar on September 4, 1971. He is a poet, editor and a blogger. Presently working with the Government of India, he has maintained a fine balance between his job and his literary pursuits. He has co-edited five anthologies ('Kasturi', 'Pagdandiyaan', 'Gulmohar', 'Tuhin' and 'Goonj').

His poems have appeared in 'Anmol Sanchayan', 'Anugoonj', 'Khamosh, Khamoshi aur Hum', 'Pratibhaon ki kami nahi', 'Shabdon ke Aranya mein', 'Arunima', 'Shabdon ki Chahalkadmi', 'Pushp-Pankhuri'.

He has won many accolades for his work. Few are best Yuva Kavi Samman (2011) by Tasleem Parikalpna Blogotsav (International Bloggers Association), 'Shobhna Kavy Srujan Samman' (2012) by Shobhna Welfare Society, 'Blog Gaurav Yuva Samman (2013) by Parikalpna (International Bloggers Association).

Mukesh Kumar Sinha is presently residing in New Delhi with his wife Anju and two sons Yash and Rishabh.

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Specification

Title: Humming Bird (Hindi)
Publisher: Hind Yugm
Author: Mukesh Kumar Sinha
Edition: Paperback
Language: Hindi
ISBN: 9381394946
EAN: 9789381394946
No. of Pages: 112
Publish Date: 2014-1-1
Binding: Paperback

Humming Bird (Hindi) Review

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हमिंग बर्ड एक बेहतरीन पुस्तक Rating of 5 out of 5 Rating of 5 out of 5 Rating of 5 out of 5 Rating of 5 out of 5 Rating of 5 out of 5
By Mukesh Kumar Sinha, 2015-05-07 20:04:16.0

हमिंग बर्ड मुकेश जी की साहित्य जगत के क्षेत्र में पहली उड़ान हैं । बड़े अरमानों और हौसलों से उन्होंने इस कविता संग्रह को पाठको के सामने रखा है । पुस्तक का नाम और कलेवर बहुत सार्थक है कवि की भावनाओं के अनुरूप । पुस्तक का हर पन्ना हमिंग बर्ड के नन्हे पंख के समान लग रहा है । पुस्तक पढ़ती हुए कवि की भावनाएं परत दर परत सामने खुलता जाता है । लेखन, व्यक्ति के व्यक्तित्व का आइना होता है । मन में छुपे रहस्य आते गए सामने ,कविता के साथ कवि का भाव भी आकार लेता गया । कविता, मन की उथल पुथल को उजागर करने का माध्यम भी है और उसका हल भी । अपने- अपने संसार की अहमियत और आवश्यकता दौनों साथ -साथ कदमताल करते हैं । मुकेश जी की कविताएँ उनकी हर मानवीयता को उजागर करती हैं , उनका प्यार, आक्रोश, आशा, निराशा और साथ में चलता है आत्म निरीक्षण ।ये आत्म निरीक्षण ही कवि और कविता को उत्कृष्ट बनाता है । मुकेश जी के शब्दों में कहीं भी नाटकीयता नहीं है। 'ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया ' की तरह जो देखा जो सोचा जो समझा उसको वैसा का वैसा रख दिया ।सादगी भरी ये कविताएं मन को मोह लेती हैं - मधु सक्सेना

'हमिंग बर्ड' Rating of 4 out of 5 Rating of 4 out of 5 Rating of 4 out of 5 Rating of 4 out of 5 Rating of 4 out of 5
By Guest, 2015-02-28 08:53:26.0

'हमिंग बर्ड', ये नाम सुनते ही आँखों के सामने एक सुनहरी, नीली-हरी सी चिड़िया फुदकने लगती है. जो दूर आसमान को छूना चाहती है, अपनी हदों का भी खूब अंदाज़ा है, इसे.....कभी इस डाल तो कभी उस डाल पे, जहाँ जी चाहा, फुदक ली ! ठीक ऐसी ही हैं, इस 'काव्य-संग्रह' की कविताएँ. आम आदमी के जीवन से जुड़ी हुई, ज़िंदगी के हर रंग को छूती हुई, इसमें रिश्तें हैं, जीवन है, एक नौकरीपेशा इंसान की सीमित क्षमताएँ हैं, थोड़ी आकांक्षाएँ हैं. सपने भी हैं और आश्वासन भी, कहीं मन हताश हो उठता है तो कभी खुद ही अपने को दिलासा देता नज़र आता है. यहाँ सपने टूटने का ग़म नहीं, निराशा दूना उत्साह भर देती है और एक उम्मीद जगाती है, जो पूरे विश्वास के साथ, सफलता की ओर धीरे-धीरे कदम बढ़ाती है ! यहाँ प्रेम है, पर देवदास-सा ग़म नहीं, दिल उदास है, पर आँखें नम नहीं ! सकारात्मक कविताएँ ही, इस 'काव्य-संग्रह' की सबसे बड़ी खूबी है. इसमें हर कविता की खुशी, अपनी-सी लगती है और हर दुख भी कभी-न-कभी महसूसा हुआ...लेकिन, मन फूट-फूटकर रोता नहीं, क्योंकि कविताएँ एक अलग ही आशावादी ऊर्जा का संचार करती हैं और पाठक को महसूस होता है कि वो यूँ ही छोटी-छोटी बातों को तूल देता रहा है, 'ज़िंदगी' इतनी भी बुरी नहीं'. 'हमिंग बर्ड' की चहक के साथ पहला पन्ना खुलता है, जो प्यार की पगडंडी को पार कर एक मकान में पहुँचता है, जहाँ आपकी मुलाक़ात एक ४० के ऊपर के इंसान से होती है, जो कभी अपने अंदर के बच्चे का ज़िक्र करता है, कभी प्रेम कविताएँ लिखता है, तो कभी, अपने शहर और परिवार को साथ लेकर चलता हुआ, बीच-बीच में हाथों की लकीरों को चुपके से ताक लिया करता है. डस्टबिन, अख़बार, तकिये, यहाँ तक कि गाँव का पुल भी पार करती है, इस संग्रह की कविताएँ, इनमें मिट्टी की खुश्बू है, अपनापन है और ये चकाचौंध से कोसों दूर सरल, सहज शब्दों के साथ अपना अर्थ बेहद आसानी से स्पष्ट कर देती हैं. अंत मैं ये स्वीकारोक्ति कि 'मैं कवि नहीं हूँ'....इन कविताओं को और भी पठनीय और रोचक बना देती है ! बधाई,लेखक की पहली उड़ान को.....शुभकामनाएँ, जाकर छू लो आसमान को ! - प्रीति 'अज्ञात'

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