RAVAN: Ek Aprajit Yodha

RAVAN: Ek Aprajit Yodha (Paperback)

By Shelendra Tiwari 
R 168
R 250
Publisher: teenage publishers
Edition: Paperback
Language: Hindi
EAN: 9789386303240
No. of Pages: 324
Publish Date: 2017-06-30
Binding: Paperback
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Title: RAVAN: Ek Aprajit Yodha
Publisher: teenage publishers
Author: Shelendra Tiwari
Edition: Paperback
Language: Hindi
EAN: 9789386303240
No. of Pages: 324
Publish Date: 2017-06-30
Binding: Paperback

RAVAN: Ek Aprajit Yodha Review

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By Guest, 2018-01-07 20:51:49.0

A good and interesting book. This is a brief description of the mythology. Some sentences like speech of gods are weightless. In brief, the book is valuable and we must read it.

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By Guest, 2018-01-05 16:37:24.0

Good explanatory brief of Ravan. This is more informative. Some sentences/talkings of gods are not suitable.

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By Guest, 2017-09-19 06:35:07.0

Extraordinary story, No contradiction with original Mahrishi Valmiki Ramayan.

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By Guest, 2017-09-07 23:17:16.0

यह एक बहुत उपयोगी किताब हैं। जिसे पढ़कर न सिर्फ आध्यात्म की बल्कि रावण और राम के बीच के प्रेम और संबंध की स्पष्ट जानकारी प्राप्त हो सकती हैं।

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By Guest, 2017-07-30 12:34:42.0

रावण आखिर क्यों है अपराजित योद्धा! स्वामीभक्त से शिवभक्त बनने की अनूठी किताब है "रावण एक अपराजित योद्धा"। इस किताब की पन्नों में जितनी शिद्दत से उतरते जाएं उतनी ही गहराई से रावण का नायकत्व सामने आता जाता है। आपके मन पर पड़ी उसके खलनायक होने की छाप धुलने लगती है। वह रावण है...दशानन...स्वामीभक्ति इतनी अपूर्व की श्राप शिरोधार्य है, स्वामी की आज्ञा की अवज्ञा नहीं। ऐसे सेवक से स्वामी भी कहां दूर रह पाता है, सेवक को खोजते-ढ़ूंढने और पाने की तीव्र इच्छा के बीच विष्णु जग को आदर्श राजा का उदाहरण दे जाते हैं। जी-हां स्वामीभक्ति की यह अजीबो-गरीब दास्तां सामने लाती है, रावण एक अपारिज योद्धा। लेखक का रावण अपराजित है क्योंकि वह योद्धाकाल की शैशवअवस्था में ही अयोध्या को विजित कर चुका है। उसे सिर्फ पुरुषों ही नहीं बल्कि स्त्रियों के युद्धकौशल पर भी संपूर्ण भरोसा है। वह सदियों पहले बराबरी के दर्जे के सामने नतमस्तक हो चुका है। इसलिए लंका की सुरक्षा सुरसा और लंकनी जैसी महिलाएं जिन्हें आप राक्षसी भी कहते हैं, करती हैं। वह स्वयं ज्योतिषाचार्य है। भूत-भविष्य का ज्ञाता है। जब शुक्राचार्य उसे मंदोदरी से विवाह के लिए रोकते हैं, समझाते हैं कि मंदोदरी की प्रथम संतान उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। तब रावण का पुरुषार्थ उसे पांव पीछे नहीं करने देता। वह मंदोदरी को छोड़ने की जगह अपनी भुजा के बल पर ग्रहों का बंदी बनाता है। ऐसे पुरुषार्थ से पूर्ण पुरुष को कोई अपराजित कहे भी तो कैसे? आप सोचिए...वह आर्यवृत को विजित करता है, लेकिन सत्ता का भोग करने की जगह अपनी लंका को स्वर्णिम बनाता है, यह गुण किसी खलनायक में कैसे हो सकते हैं। रावण अपराजित है, क्योंकि जब वह सहस्त्रार्जुन से हारता है। अपमान के घूट पीते हुए कारागार में बंदियों की तरह जीवन व्यतीत करता है...जिसे दादा द्वारा क्षमायाचना करने पर जंजीरों की जकड़न से मुक्ति मिलती है वह योद्धा नैराश्य के बवंडर में नहीं घिरता। अपनी कमजोरियों पर विजय पाने के लिए घोर तप करता है और अमरत्व का वरदान प्राप्त करता है। ऐसा योद्धा अपराजित कैसे हो सकता है। वह योद्धा जो बालि से हार के बाद उसे मित्र बना ले, जो अपने दुश्मन को विजयी भवः का आशिर्वाद दे। जी हां, राम ने भी रावण की चरण वंदना की थी...युद्घ में विजय के लिए...क्यों? इसके जवाब के लिए पुस्तक के पन्नों को खंगालना होगा।

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